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18 November 2018

आइये जानते है कैसे नीव पड़ी राजस्थान कि राजधानी जयपुर की

गुलाबी नगर के नाम से मशहूर जयपुर कि स्थापना 18 नवम्बर 1727 को कि गई थी . जयपुर कि स्थापना शिकारगाह पर कि गई थी . दरअसल महाराजा जयसिंह ( द्वितीय ) को  नाहरगढ़ के नीचे 100 एकड़ के पानी से भरा एक जंगल बहुत प्रिय था इस जंगल में महाराजा जयसिंह अक्सर शिकार खेलने आया करते थे . बस यही पर जयपुर कि स्थापना कि गई आइये जानते इससे जुड़े कुछ और किस्से --
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महाराजा जयसिंह ने दरबार में फेसला लिया कि आमेर के पास एक ऐसा भव्य नगर बसाया जाये जिसकी प्रत्येक ईमारत और सड़क करीने से बनी हो . इस नगर के हर एक रास्ते कि अलग पहचान होनी चाहिए और लोगो के रहने क्षेत्र उनकी गतिविधिओ से पहचाने जाने चाहिए . बस इसी फेसले के बाद गुलाबी नगरी का निर्माण शुरू हो चूका था और राजा जयसिंह ने अपनी पसंद के शिकारगाह में सबसे पहले एक चोकोर तालाब का निर्माण करवाया जिसका नाम "तालकटोरा" रखा गया .


तालकटोरा तालाब के पास ही जयनिवास नाम का एक महल बनवाया गया फिर इसको वृदावन से आये गोविन्द देवजी महाराज को दान में दे दिया गया था . जयपुर के निर्माण का बीड़ा वास्तुकार विद्याधर ने सबसे पहले उठाया और ब्रह्मांड व समय चक्र के द्योतक वृत तथा धरती के द्योतक वृगाकार आकृति का जयपुर शहर का निर्माण शुरू किया गया .
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विद्वान् पंडित जगन्नाथ सम्राट व राजगुरु रत्नगर पोंड्रिक ने सबसे पहले गंगापोल कि नींव रखी . वास्तुकार विद्याधर ने नो ग्रहों के आधार पर शहर में 9 चोकडिया और सूर्य के सात घोड़ो के आधार पर सात दरवाजो युक्त परकोटा बनवाया . पूर्व से पश्चिम कि और जाती सड़क पर पूर्व कि ओर सूरजपोल और दक्षिण कि ओर चांदपोल बनवाया गया . इनके बीच से पानी कि नहर और सुरंग गुजरती थी जो फिलहाल मेट्रो के प्रोजेक्ट के कारण पूरी तरह नष्ट हो चुकी है .
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 ब्रह्मांड के नियमो के आधार पर होने के कारण जयपुर को अभी तक सबसे सुरक्षित शहर माना गया है . परन्तु अब विकास के नाम पर इसकी प्राचीन विरासत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है . जगह जगह पुरानी इमारतो को तोड़कर काम्प्लेक्स बनाये जा रहे है , दोस्तों अब वो दिन दूर नहीं जब जयपुर अपनी प्राचीन विरासत को पूर्णतया खो देगा . इस पर जनता भी क्या कर सकती है , अगर जनता आवाज उठाएगी तो सत्ता में बेठे लोग कहेंगे हमे सही तरह से काम करने नहीं दिया जा रहा है , बस जयपुर का तो अब भगवान कि रखवाला है .


जब जयपुर का निर्माण शुरू हुआ था तो यहाँ पहाड़ भी थे और किले भी थे , मित्रो किले ने तो यही सोचा होगा कि मेरे लिए एक सुन्दर दुल्हन तेयार कि जा रही है . प्रसिद्ध राजस्थानी कवि कन्हेया लाल सेठिया ने अपनी "धरती धोरा री... " कविता में इसको नगरो कि पटरानी कहा है , जो इस शहर पर सही बेठता है .
291 साल के हो चुके जयपुर को देखने के लिए दुनियाभर से पर्यटक आते है और अब तो वर्तमान सरकार के प्रयाश के कारण पर्यटकों कि संख्या में वृद्धि भी देखी गई .

मित्रो राजस्थान कि राजधानी जयपुर कि प्राचीन धरोहर को बचाने के लिए कोन कोन से कदम उठाने चाहिए कमेंट में जरुर लिखे . और इस लेख को अपने प्रियजनों तक पहुंचाने के लिए शेयर जरुर करें . 

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