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19 November 2018

जरुर पढ़े - इन्दिरा गाँधी के जीवन अनसुने किस्से

भारत कि चोथी और पहली महिला प्रधानमंत्री कि जयंती 19 नवम्बर यानि आज  है . इन्दिरा गाँधी को आज भी भारतीय राजनीती के इतिहास कि सबसे मजबूत इरादों वाली महिला माना जाता है . आज हम इन्दिरा गाँधी के जीवन के ऐसे पहलू आपसे शेयर करने जा रहे है जो कम लोग ही जानते है . परन्तु सबसे पहले इन्दिरा और फिरोज खान कि शादी का किस्सा तो पढ़ लो .....

जब फिरोज खान ने इन्दिरा गाँधी को प्रपोज किया था तो ये सिर्फ 16 साल के और इन्दिरा 13 साल कि थी ऐसा बर्टिल फलक कि किताब " feroze the forgotten gandhi "में लिखा है . तब  फीरोज ने इन्दिरा को कई बार प्रपोज किया था परन्तु ये उम्र में छोटी होने के कारण इन्होने इनकी कम ही ध्यान दिया था .


इसके बाद दोनों कि मुलाकात पेरिस में हुई और इन्होने शादी का फेसला लिया आपको बता दे कि इन्दिरा और फीरोज खान दोनों ही लन्दन में साथ पढ़े थे . इन्दिरा के पिता जवाहरलाल नेहरू को इस रिश्ते से नाराजगी थी परन्तु इन्दिरा अपने पिता कि और ध्यान न देते हुए फीरोज से 1942 में भारत छोडो आन्दोलन के समय शादी कर ली . महात्मा गाँधी ने फीरोज को अपना सर नेम दिया इसलिए आज भी गाँधी सर नेम का उपयोग किया जाता है .

इनका बचपन आजादी कि लड़ाई में बीता 

बचपन से ही इन्दिरा नेहरू राजनीती और आजादी कि लड़ाई में भाग लेने लगी थी . पत्रकारों से बातचीत में इन्होने बताया था कि इनकी कोई भी सहेली नहीं रही है बस वो अपने परिवार के साथ रहना पसंद करती थी . कॉलेज में भी बहुत दोस्त बने पर उनसे भी इन्दिरा दूरी बनाकर रहती थी . इन्दिरा को अपने पिता बहुत अच्छे लगते थे और वो हर समय इनके साथ ही रहना पसंद करती थी .


जब इन्दिरा को प्रधानमंत्री बनाने पर अमेरिका हेरान हुआ 

जब इन्दिरा को प्रधानमंत्री का पद सोंपा गया था तो अमेरिका बहुत हेरान हुआ ऐसा उनकी बुआ कृष्णा ने अपनी किताब " डिअर टू बिहोल्ड " में लिखा था . जब ये पहली बार अमेरिका पहुंची तो पत्रकारों ने प्रथम उनको तव्वजो दी और वहाँ के समाचार - पत्रों में छा गयी . इनका पहला अमेरिकी दौरा बहुत शानदार रहा था

1971 भारत - पाक युद्ध और बाग्लादेश बना 

1971 में पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सरकार और सेना अपने नागरिको पर जुल्म ढा रही थी .जिससे यहाँ के नागरिक सरकार  और सेना के विरुद्ध जंग लड़ने लगे . इस समय भारत में लगभग 10 लाख शरणार्थी आ गये जिससे अशांति का माहोल बन गया , 25 अप्रेल को इन्दिरा ने थलसेना अध्यक्ष से कहा कि अगर पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए अगर जंग लड़नी पड़े तो उन्हें कोई परवाह नहीं है


नवम्बर 1971 में भारतीय सीमा में अन्दर तक 10 हेलिकॉप्टर घुस आये थे इसके बाद भारत ने ऐसा नहीं करने कि चेतावनी दी , पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति याहया खान ने 10 दिन के अन्दर जंग कि धमकी दे डाली . 3 दिसम्बर को पाकिस्तान ने आखिर वो गलती कर ही दी जिसका भारत को बेसब्री से इंतजार था . पाकिस्तानी सेना ने भारतीय शहरो पर बमबारी शरू कर दी थी जिसका भारत ने करारा जवाब दिया . भारतीय सेना मुक्तवाहिनी के साथ मिलकर पाकिस्तान को हरा दिया . 16 दिसम्बर को भारतीय सेना ढाका पहुँच गयी और पाकिस्तानी सेना को आत्मसमर्पण करना पड़ा था .

इन्दिरा का आखिरी भाषण -

30 अक्टूबर 1984 कि दोपहर को इन्दिरा ने भुवनेश्वर में अपना आखिरी भाषण दिया था . इन्होने भाषण के बीच में लिखा हुआ छोड़कर यह कहा - "मैं आज यहां हूं. कल शायद यहां न रहूं. मुझे चिंता नहीं मैं रहूं या न रहूं. मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है. मैं अपनी आखिरी सांस तक ऐसा करती रहूंगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे ख़ून का एक-एक क़तरा भारत को मजबूत करने में लगेगा."  उनके इस भाषण से लोग हेरान हो गये थे . खुद कांग्रेस पार्टी भी नहीं समझ पायी कि इन्होने ऐसा क्यों कहा था . इस भाषण के बाद वो दिल्ली आ गयी . 31 अक्टूबर कि सुबह 9 बजे वो अकबर रोड पर चल रही थी जहाँ उनके ही सुरक्षा कर्मी सतवंत सिंह ने उन्हें मार दिया .

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