माँ भारती

Maabharati: A Hindi knowledge Sharing website, Legends of Mahatmas, Technologies, Health, Today History, Successful People's stories and other information. Former- life137.com

Breaking

08 December 2018

सुभाषचंद्र बोस की जीवनी और जानिए कैसे हुई बोस की मृत्यु

सुभाष चन्द्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रख्यात नेता थे .  सुभाष चन्द्र बोस को नेताजी से भी बुलाया जाता था . उनके द्वारा दिया गया नारा " जय हिन्द " आज भी लोकप्रिय है इसके अलावा उन्होंने " तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा " नारा भी दिया था . यह भी लम्बे समय तक प्रचलित रहा था . हालाँकि भारतीय आजादी का श्रेय महात्मा गाँधी और नेहरु जैसे नेताओ को दिया जाता है . बोस के योगदान को हम कम नहीं आंक सकते है . कुछ इतिहासकार मानते है कि नेताजी ने भारत कि आजादी के लिए जापान और जर्मनी से सहायता लेने कि कोशिश कि तो अंग्रेजो को यह बुरा लगा और अंग्रेजो ने 1941 में नेताजी को ख़त्म करने का आदेश दे दिया था .

मित्रो रासबिहारी बोस जापान और कुछ एशियाई देशो के सहयोग से आजाद हिन्द फौज कि स्थापना कि थी और बाद में इसकी कमान सुभाषचंद्र बोस को सौंप दी गयी . 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिन्द फौज ने आजाद भारत कि पहली सरकार बनाई जिसके कब्जे में अंदमान और निकोबार द्वीप समूह थे . इसको जर्मनी , जापान , चीन इटली और अन्य देशो से मान्यता मिली . बोस इन द्वीपों में गए और इनका नामकरण किया .


1944 में आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजो पर दोबारा आक्रमण किया और कई सारे प्रदेश अपने कब्जे में कर लिए . कोहिमा के युद्ध ( 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक)  को कोन भूल सकता है यह अंग्रेज सरकार और आजाद हिन्द फौज के बीच लड़ा सबसे भयकर युद्ध था . यहीं से अंग्रेजो का पतन होना शुरू हो गया था . हालाँकि यह युद्ध अंग्रेजो ने जीता था .

नेताजी का प्रारम्भिक जीवन 

नेताजी का जन्म 23 जनवरी 1897 में कटक उड़ीसा में हुआ था . उनके पिता का नाम जानकी दास बोस और माता प्रभावती देवी थी .  जानकी दास और प्रभावती के 14 संताने थी जिसमे छह बेटिया और आठ बेटे थे . सुभाषचंद्र बोस उनमे से 9 वीं संतान और पांचवे बेटे थे . जानकीदास पेशे से वकील थे पहले वे सरकारी वकील थे और बाद में अपनी निजी प्रैक्टिस करने लगे . सुभाष चन्द्र बोस पढने में हमेशा से होनहार थे और दसवीं और स्नातक में पहला स्थान प्राप्त किया था . बोस ने कोलकाता के स्कोटिश चर्च कॉलेज से दर्शन शास्त्र में स्नातक कि डिग्री ली थी . उसी समय सेना में भर्ती हो रही थी बोस ने भर्ती होने कि कोशिश कि परन्तु आँखों कि खराबी के कारण नाकामयाब रहे . सुभाषचंद्र बोस स्वामी विवेकानंद के विचारों को हमेशा मानते थे . अपने पिता और परिवार कि इच्छा के कारण बोस 1919 में इंग्लेंड भारतीय प्रशासनिक सेवा कि तेयारी के लिए चले गये .


भारतीय प्रशानिक सेवा के लिए उन्होंने 1920 में आवेदन किया था और वे इसमें कामयाब भी रहे और चौथा स्थान प्राप्त किया . परन्तु उसी जलियांवाला बाग़ हत्याकांड हुआ इससे नेताजी बहुत आहात हुए और उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया . इसके बाद भारत आ गये और महात्मा गाँधी से मिलकर कांग्रेस में शामिल हो गये .गांधीजी कि आज्ञा से बोस ने देशबंधु चितरंजन के साथ काम करना शुरु किया बाद बोस ने चितरंजन दास को अपना राजनितिक गुरु बताया था . अपनी मेहनत और अच्छे कार्यो के कारन नेताजी जल्द बड़े नेताओ में शामिल हो गये . 1928 में आये साइमन कमिशन का नेताजी और कांग्रेस ने विरोध किया था उस समय काले झंडे दिखाए गये थे .

कांग्रेस के सदस्य के तौर पर पूर्ण स्वराज की मांग

कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन 1928 मोतीलाल नेहरु के नेतृत्व में कोलकाता में हुआ इस अधिवेशन में अंग्रेज सरकार को डोमिनियन स्टेट्स देने के लिए एक वर्ष का समय दिया गया . उस समय गांधीजी पूर्ण स्वराज कि मांग से सहमत नहीं थे और वहीँ दूसरी और सुभाषचंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरु को पूर्ण स्वराज की मांग से हटना कतई मंजूर नहीं था . 1930 में बोस ने इंडिपेंडेंट लीग का गठन किया . सन 1930 के सिविल डिसओबिड़ेंस आन्दोलन के दोरान नेताजी को गिरफ्तार कर लिया गया और जैल भेजा गया .


गांधीजी-इरविन पैक्ट के बाद 1931 में नेताजी कि रिहाई हुई . नेताजी ने इस गांधीजी-इरविन पैक्ट का जमकर विरोध किया और वे सिविल डिसओबीडेंस आन्दोलन को रोकने वाले फेसले से नाखुश हुए . इस समझोते में अंग्रेज सरकार भगतसिंह जैसे महान क्रान्तिकारियो की करने को राजी नहीं थी . गाँधी ने भगतसिंह कि रिहाई कि और ज्यादा ध्यान नहीं दिया था . इसलिए नेताजी चाहते थे की नेताजी अपना समझोता वापिस ले . परन्तु गांधीजी अड़े और अपने वचन को तोड़ने से इनकार कर दिया . इसके अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी कि सजा दी . इसके बाद नेताजी कांग्रेस और गांधीजी से नाराज हो गये थे .


यूरोप यात्रा

सुभाष चन्द्र बोस को बंगाल अधिनियम के अंतर्गत दोबारा जैल जाना पड़ा और इस बार वे एक साल से लम्बे समय तक जैल में रहे बाद बीमारी के कारण उनको जैल से रिहाई मिली और उनको इलाज के लिए यूरोप जाना पड़ा . यूरोप में भी नेताजी नहीं रुके उन्होंने भारत और यूरोप के मध्य राजनेतिक और सांस्कृतिक सबंध बनाने के लिए कई शहरों में केद्र स्थापित किये .  यूरोप में नेताजी इटली के नेता मुसोलिनी , आयरलेंड के नेता डी वालेरा जैसे नेताओ से मुलाक़ात कि और अच्छे सबंध कि और जोर दिया . नेताजी की मुलाक़ात यूरोप विट्ठल भाई पटेल से हुई . और उनकी बातचीत " पटेल-बोस" विश्लेषण के नाम से प्रसिद्ध हुई . इस विश्लेषण में उन दोनों गाँधी के नेतृत्व का जमकर निंदा कि थी . इसके कुछ समय बाद विट्ठल भाई बीमार हो गये और उनकी सेवा नेताजी ने की कुछ समय बाद विट्ठल भाई कि मृत्यु हो गयी परन्तु मृत्यु से पहले विट्ठल भाई ने अपनी वसीयत सुभास चन्द्र बोस के नाम कर दी . सरदार पटेल ने इस वसीयत को नहीं माना और कोर्ट में ले गये जहाँ पटेल की जीत इसके बाद इस वसीयत को पटेल ने गांधीजी के हरिजन सेवा कार्य के लिए भेंट कर दिया .
भारत रत्न नेल्सन मंडेला के संघर्षशील जीवन की कहानी 

नेताजी का प्रेमविवाह 

1934 में सुभाष चन्द्र बोस आस्ट्रिया थे  उनके अपनी एक किताब लिखने के लिए एक सहायक कि आवश्कता पड़ी इसमें उनके एक दोस्त ने मदद कि और सुभाष की मुलाकात एमिली शेंकल से करवाई . सुभाष ने इनको काम पर रख लिया बाद में इनके रिश्ते मधुर होते गये .


एमिली के पिता को यह कतई मंजूर नहीं था कि उनकी बेटी एक भारतीय के निचे काम करे बाद में जब वो बोस से मिले तो इनकी काबिलियत और बात करने के तरीके से बहुत इम्प्रेस हुए . एमिली और बोस के रिश्ते इतने मधुर हुए कि उन्होंने 1942 में हिन्दू रीति - रिवाज से शादी कर ली . एमिली ने एक पुत्री को जन्म दिया जब उनकी यह पुत्री मात्र चार सप्ताह कि थी तब बोस ने इसको देखा और अनीता बोस नाम दिया .


कांग्रेस के अध्यक्ष 

कांग्रेस का 51 वां अधिवेशन 1838 में हरिपुरा में हुआ इस अधिवेशन में गांधीजी ने सुभाष चन्द्र को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना और इनका स्वागत 51 बैलो द्वारा खींचे गये रथ से हुआ . नेताजी ने इसके बाद महान वैज्ञानिक विश्वेशवरय्या एक अध्यक्षता में एक विज्ञान केंद्र की स्थापना की .


सुभाष चन्द्र को अध्यक्ष बनाने के बाद गांधीजी इनके कार्यो ने नाखुश हुए और इन्हें पद से हटाना चाहा परन्तु रवीन्द्रनाथ टेगोर और अन्य लोगो के सहयोग से सुभाष इस पद बने रहे . गांधीजी सीतारम्मेया को अध्यक्ष बनाना चाहते थे . इसके लिए चुनाव भी हुआ पर नजीजा बोस के पक्ष में आया ओर वे 203 मतो से जीत गये . सितारम्मेया कि इस हार को गांधीजी ने अपनी हार बताया . 1939 में कांग्रेश का अधिवेशन त्रिपुरा में हुआ इसमें गांधीजी और इनके सहयोगियों ने भाग नहीं लिया इस समय बोस भी तेज बुखार से पीड़ित थे . बाद में बोस ने 29 अप्रैल 1939 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया .

इंदिरा गाँधी के जीवन के अनसुने किस्से 

फॉरवर्ड  ब्लॉक की स्थापना 

3 मई 1939 को नेताजी ने कांग्रेस को सदस्य रहकर ही उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। बाद में इनको कांग्रेस से बाहर कर दिया गया और फॉरवर्ड ब्लॉक पार्टी एक स्वतन्त्र पार्टी बन गयी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस पार्टी ने स्वतंत्रता  संग्राम को और तेज करने का फैसला लिया।


इसके बाद 8 सितम्बर 1939 को युद्ध की और कड़े रुख के कारन कांग्रेस ने अपनी कार्य समिति में सुभाष चंद्र बोस को आमत्रित किया यहाँ बोस ने खा की अगर आप हमारा साथ नहीं देना चाहते है तो कोई बात नहीं फॉरवर्ड पार्टी अकेले ही अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध जारी रखेगी। इसके बाद इस पार्टी के सदस्यों ने भारत की गुलामी के प्रतीक हालवेट स्तम्भ को मिटटी में मिला दिया और सुभाष ने कहा इसी तरह हम अंग्रेजो को मिटटी में मिला देंगे , इसके बाद इस पार्टी के सभी नेताओ को गिरफ्तार कर लिया गया।  परन्तु बोस ने आमरण अनशन शुरू कर दिया तबियत खराब होने के कारण इनको रिहाई मिली और इनके ही घर में नजरबन्द कर दिया। 16 जनवरी 1941 में एक योजना के तहत ये यहां से भाग निकले और बर्लिन पहुँच गए।

आजाद हिन्द फौज 

दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है की धारणा के मद्देनजर नेताजी ने भारत से अंग्रेजो को निकलने के लिए जर्मनी और जापान की मदद मांगी।  बर्लिन से जनवरी 1942 में उन्होंने एक रेडिओ प्रसारण शुरू कर दिया जिससे भारतीय लोगो का उत्साह बढ़ गया। 1943 में बोस सिंगापुर आ गए और पूर्वी एशिया में इन्होने रास बिहारी से मुलाक़ात की और आजाद हिन्द फौज के सदस्य बन गए इस समय सुभाष चंद्र बोस को नेताजी कहा जाने लगा
अब आजाद हिन्द फौज भारत की और  बढ़ी।  21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिन्द फौज ने आजाद भारत कि पहली सरकार बनाई जिसके कब्जे में अंदमान और निकोबार द्वीप समूह थे . इसको जर्मनी , जापान , चीन इटली और अन्य देशो से मान्यता मिली . बोस इन द्वीपों में गए और इनका नामकरण किया .


1944 में आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजो पर दोबारा आक्रमण किया और कई सारे प्रदेश अपने कब्जे में कर लिए . कोहिमा के युद्ध ( 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक)  को कोन भूल सकता है यह अंग्रेज सरकार और आजाद हिन्द फौज के बीच लड़ा सबसे भयकर युद्ध था . यहीं से अंग्रेजो का पतन होना शुरू हो गया था . हालाँकि यह युद्ध अंग्रेजो ने जीता था .  द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी और जापान की हार हुई और आजाद हिन्द फौज अपने सपने पूरे नहीं कर पायी।


सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु कैसे हुई

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान की करारी हार के बाद नेताजी को एक नए साथी की तलाश थी इसलिए उन्होंने रूस की और 18 अगस्त 1945 एक विमान से पलायन किया इस दौरान वे लापता हो गए।  बाद में जापान के एक रेडिओ ने 23 अगस्त 1945 को बताया की नेताजी एक विमान से आ रहे थे जो की ताइवान में क्षति ग्रस्त हो गया और नेताजी इसमें जल गए उन्होंने यहां के एक सैनिक अस्पताल में दम तोड़ दिया  . भारतीय अभिलेखागार की रिपोर्ट के अनुसार नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को हो गयी थी।
आजादी के बाद भारत सरकार ने 1956 और 1977 में नेताजी की मृत्यु की जानकारी का पता लगाने के लिए आयोग का गठन किया दोनों ने ही नतीजा निकाला की नेताजी की मृत्यु विमान हादसे में हुई।  1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व तीसरे आयोग का गठन किया गया 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बताया की उनके यहाँ किसी भी विमान का हादसा नहीं हुआ था।

18 अगस्त 1945 को नेताजी कहा लापता हुए यह भारतीय इतिहास सबसे विवादित विषय रहा है।

ये भी पढ़े
शहीद भगत सिंह की जीवनी 
भारत रत्न नेल्सन मंडेला के संघर्षशील जीवन की कहानी 
राजेंद्रप्रसाद के जीवन के अनसुने किस्से 
इंदिरा गाँधी के जीवन के अनसुने किस्से 


No comments:

Post a Comment

माँ भारती का नया लेख अपने ईमेल में पाए

जिस ईमेल में आप माँ भारती का नया लेख पाना चाहते है वह नीचे बॉक्स में इंटर करे:

Delivered by माँ भारती