माँ भारती

Maabharati: A Hindi knowledge Sharing website, Legends of Mahatmas, Technologies, Health, Today History, Successful People's stories and other information.

Breaking

09 December 2018

भगत सिंह का जीवन परिचय - जानिए क्यों करते थे गाँधी का विरोध

शहीद भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक थे . मात्र 24 साल कि छोटी सी उम्र में माँ भारती के लिए बलिदान देने वाला यह वीर हमेशा के लिए अमर हो गया था . शहीद भगत सिंह के लिए क्रांति का अर्थ था - अन्याय से पैदा हुए हालातो को बदलना . उन्होंने यूरोपीय क्रन्तिकारी आन्दोलन के बारे में पढ़ा और समाजवाद कि और अत्यधिक आकर्षित हुए . उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन को खत्म करके भारतीय समाज के पुर्ननिर्माण के लिए राजनितिक सत्ता हासिल करना बहुत जरुरी है

हालाँकि अंग्रेजी हुकूमत ने उनको आंतकवादी घोषित कर दिया था परन्तु शहीद भगत सिंह हमेशा से ही आंतकवाद के बड़े आलोचक रहे . सरदार भगत सिंह ने भारत के क्रन्तिकारी आन्दोलन को एक नई दिशा दी थी . उनका लक्ष्य  ब्रिटिश साम्राज्य को भारत से उखाड़ फेंकना  का था . अपनी दूरदर्शिता और दृढ इरादे जैसी अपनी विशेषता के कारण भगत सिंह राष्ट्रिय आन्दोलन के दुसरे नेताओ से हटकर थे . इस समय जब महात्मा गाँधी और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस ही देश कि आजादी के लिए एक मात्र विकल्प था भगत सिंह एक नई सोच के साथ दुसरे विकल्प के रूप में देश के सामने उभरकर आये थे .


सरदार भगत सिंह का जन्म 27 सिंतबर 1907 को पंजाब के नवाशहर जिले के खटकर कलां गाँव के एक सिख परिवार में हुआ था . अब नवाशहर जिले को शहीद भगत सिंह नगर के नाम से जाना जाता है . भगत सिंह पिता किशन सिंह और माता विद्यावती के तीसरी संतान थे .

भगत सिंह का परिवार भी स्वंत्रतता संग्राम से सक्रिय रूप से जूडा हुआ था . उनके पिता सरदार किशन सिंह और चाचा सरदार अजीत सिंह ग़दर पार्टी के सदस्य थे . हम आपको बतादे कि ग़दर पार्टी कि स्थापना अंग्रेज सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए अमेरिका में हुई थी . परिवार के माहोल का भगत सिंह के दिमाग पर बहुत असर पड़ा और बचपन से ही उनके नश - नश में देशभक्ति कि भावना कूट-कूट कर भरी गई थी .

1916 में लाहोर के DAV विद्यालय में पढ़ते समय सरदार भगत सिंह महान क्रन्तिकारी नेता लाला लाजपत राय और रास बिहारी बोस के सम्पर्क में आये . उस समय पंजाब राजनैतिक रूप से काफी उत्तेजित था . जब जलियांवाला बाग़ हत्याकांड हुआ था तब भगत सिंह केवल 12 साल के ही थे . जलियांवाला हत्याकांड ने उनको बहुत व्याकुल कर दिया था . इस हत्याकांड के अगले दिन सरदार भगत सिंह जलियांवाला बाग़ गए और उस जगह से मिटटी को इकट्ठा करके इसे अपनी पूरी जिन्दगी एक निशानी के रूप में रखा .इस हत्याकांड के बाद उनका ब्रिटिश शासन ख़त्म करने का सकल्प और भी सदृढ़ हो गया .

महात्मा गाँधी जी ने जब 1921 में असहयोग आदोलन कि शुरुआत कि थी तब भगत सिंह अपनी पढाई छोड़कर इस आन्दोलन के हिस्सा बन गये . वर्ष 1922 में जब चौरी-चौरा काण्ड के बाद महात्मा गाँधी ने अपना असहयोग आन्दोलन वापिस लिया तो भगत सिंह बहुत आहात हुए , और इससे अहिंसा में उनका विश्वास लगभग ख़त्म सा हो गया . और उन्होंने माना कि सशस्त्र क्रांति ही भारत को आजादी दिलाने का एक मात्र विकल्प है . अपनी पढाई को पूरी करने के लिए भगत सिंह ने लाहोर में स्थित राष्ट्रिय विद्यालय में प्रवेश लिया . राष्ट्रिय विद्यालय कि स्थापना लाला लाजपत राय ने कि थी . यह विद्यालय क्रन्तिकारी गतिविधियों का मुख्य केंद्र माना जाता था . यही पर ही भगवती चरण वर्मा , सुखदेव , और दुसरे क्रन्तिकारी भगत सिंह के सम्पर्क में आये .

आप ये भी पढ़ सकते है
भारत की पहली महिला डॉक्टर के जीवन की अनसुनी कहानी 
भारत की पहली महिला अन्तरिक्ष यात्री कल्पना चावला के जीवन की कहानी 


सरदार भगत सिंह विवाह से बचने के लिए घर छोड़कर कानपुर चले गये . कानपुर में वे गणेश शंकर विद्यार्थी के सम्पर्क में आये और उनसे क्रांति का प्रथम पाठ सिखा . पंरतु जब भगत को अपनी दादी माँ की बीमारी का पता चला तो वे घर वापिस लोट आये और अपने गाँव से ही क्रन्तिकारी गतिविधियों को जारी रखा .

शहीद भगत सिंह ने लाहौर जाकर नौजवान भारत सभा के नाम से एक क्रन्तिकारी संगठन बनाया और पूरे पंजाब में क्रांति का सन्देश फेलाना शुरू कर दिया . वर्ष 1928 में दिल्ली में क्रांतिकारियों कि एक बैठक में हिस्सा लिया और यहीं पर वे चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में आये . इसके बाद भगत सिंह और आजाद ने मिलकर हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ कि स्थापना की . इस संघ का मुख्य उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के द्वारा हिंदुस्तान को आजादी दिलाना था .

फ़रवरी 1928 कि बात है साइमन कमिशन इंग्लेंड से भारत लाया गया इसका मुख्य उद्देश्य - भारत के लोगो कि स्वयत्तता और राजतन्त्र में भूमिका में थी . पंरतु इस आयोग में कोई भी भारतीय नागरिक सदस्य नहीं था इसलिए भारत में इसका जमकर विरोध हुआ . लाहौर में साइमन कमिशन के खिलाफ नारेबाजी कर रहे लाला लाजपत राय और उनके साथियों पर कुर्र्ता पूर्वक लाठीचार्ज किया गया . जिससे वे बहुत अधिक घायल हो गये और उनका देहांत हो गया .


भगत सिंह ने लाला कि मौत का बदला लेने के लिए अग्रेज अधिकारी स्कॉट ( यह लाला कि मौत का जिम्मेदार था )  को मारने का सकल्प लिया . परन्तु गलती से भगत सिंह और उनके साथियों ने सहायक अधीक्षक सान्डर्स को स्कॉट समझकर उनको गोली मार दी . मौत कि सजा से बचने के लिए अब भगत सिंह ने लाहौर छोड़ दिया .

अंग्रेज सरकार ने भारतीय लोगो को अधिकार और आजादी देने और असंतोष के मूल कारण को खोजने के बजाय और अधिक दमनकारी नीतियों का प्रयोग किया . अंग्रेज सरकार डिफेंस ऑफ़ इंडिया एक्ट लेकर आई जिससे सरकार ने पुलिस को दमनकारी अधिकार दे दिया . इस एक्ट के अनुसार पुलिस संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े जूलूस को रोक सकती थी और भारतीय लोगो को गिरफ्तार कर सकती थी . परन्तु केन्द्रीय विधानसभा में यह एक्ट एक मत से हार गया . फिर भी ब्रिटिश सरकार इसे जनता के हित में कहकर अध्यादेश के रूप में लेकर आई . भगत सिंह और उनको साथियों ने केद्रीय विधानसभा यानि जहाँ पर यह अध्यादेश लाने के लिए बैठक का आयोजन किया जाना वहाँ बम फेंकने कि योजना बनाई . आपको बता दे कि उनका उद्देश्य यहाँ किसी को मारना या नुकसान पहुँचाना नहीं था बल्कि वे अंग्रेज सरकार को बताना चाहते थे उनकी दमनकारी नीतियों को अब और अधिक नहीं सहा जायेगा .


8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने केद्रीय विधानसभा सत्र के दोरान बम फेंक दिया इससे किसी को नुकसान नहीं पहुंचा और भगत सिंह व बटुकेश्वर ने यहाँ से भागने के वजाय जान बुझकर गिरफ्तारी दे दी .  अपने बचाव के लिए भगत सिंह ने किसी भी बचाव पक्ष के वकील कि न्युक्ति करने से मना कर दिया . जैल में भगत सिंह ने जैल अधिकारियो द्वारा साथी क्रांतिकारियों के साथ अमानवीय व्यवहार के कारण भूख हड़ताल शुरू कर दी .

7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु को विशेष न्यायालय ने मौत फांसी कि सजा दी . भारत के तमाम राजनेतिक नेताओ द्वारा अत्यधिक दबाव और कई अपीलों के बावजूद भगत सिंह और उनके साथियों को 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई . और यह वीर हमेशा के लिए अमर हो गया .

ये भी पढ़े
भारत की पहली महिला डॉक्टर के जीवन की अनसुनी कहानी 
भारत के पहले राष्ट्रपति के जीवन में अनसुने से किस्से
बाबा साहेब आम्बेडकर के संघर्षशील जीवन की कहानी 
भारत की पहली महिला अन्तरिक्ष यात्री कल्पना चावला के जीवन की कहानी 

अगर आपको माँ भारती के वीर पुत्र के बलिदान कि यहगाथा पसंद आई है तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करे ताकि उनको भी इस वीर कि गाथा पढने को मिले . आप हमारे कार्य की सराहना कमेंट में लिख सकते है .



No comments:

Post a Comment

माँ भारती का नया लेख अपने ईमेल में पाए

जिस ईमेल में आप माँ भारती का नया लेख पाना चाहते है वह नीचे बॉक्स में इंटर करे:

Delivered by माँ भारती