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29 December 2018

1962 में भारत-चीन युद्ध क्यों हुआ था और इसमें भारत के हारने की वजह क्या थी

चीन में 1959 में तिब्बती विद्रोह के बाद दलाई लामा भारत आ गये और भारत ने इनको शरण दे दी थी . तो इससे भारत चीन सीमा पर हिंसक घटनाये शुरू हो गयी थी . भारत ने फॉरवर्ड निति के तहत मैकमोहन रेखा से लगी सीमा तक अपनी सैनिक चौकिया सिमित रखी जो 1959 में चीनी प्रीमियर झोउ ऍन लाइ के द्वारा घोसित वास्तविक नियंत्रण रेखा के पूर्वी भाग के उत्तर में थी।


चीनी सेना द्वारा 20 अक्टूबर 1962 को लद्दाख और मैकमोहन रेखा के पार हमले शुरू हो गए थे।  चीनी सेना दोनों ही मोर्चो पर भारतीय सेना से भारी साबित हुई और पशिचमी क्षेत्र " चुशूल " में "रेजांग - ला " तथा पूर्व में " तवांग " पर अवैध रूप से कब्ज़ा कर लिया था। इसके बाद 20 नवम्बर  1962 को  चीन द्वारा युद्ध विराम लागू कर दिया गया और दोनों विवादित क्षेत्रो में से एक को चीन ने अपना कब्ज़ा छोड़ दिया।  हालाँकि अक्साई चीन से भारतीय पोस्ट व गश्ती दल को हटा दिया गया जो की संघर्ष के बाद चीन के कब्जे में जा चूका था।


भारत-चीन युद्ध कठिन परिस्थितियों में हुई लड़ाई के लिए जाना जाता है इस युद्ध में ज्यादातर लड़ाई 4250 मीटर ( लगभग 14000 ) से भी अधिक ऊंचाई पर लड़ी गई थी।  इस प्रकार की परीस्थितियों  में दोनों ही पक्षों को रशद आपूर्ति और लॉजिस्टिक समस्याएं उतपन्न हुई थी। इस युद्ध में भारत और चीन दोनों ही देशो द्वारा नौसेना या वायुसेना का इस्तेमाल नहीं किया गया था।


चीन और भारत के मध्य एक लम्बी सीमा है जो भूटान व नेपाल के कारण तीन भागो में फैली हुई है।  यह सीमा हिमालय पर्वतो से लगी हुई है जो बर्मा और आधुनिक पाकिस्तान तक लगी  हुई है।  इसी सीमा पर विवादित क्षेत्र स्थित है।  पश्चिम में अक्साई चीन है. यह चीन के अधिकार क्षेत्र झिंजियांग और तिब्बत के मध्य स्थित है। पूर्वी सीमा पर बर्मा और भूटान के मध्य  वर्तमान का भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश स्थित है 1962  के युद्ध में इन्ही दोनों क्षेत्रो में चीनी सैनिक आ गए थे।

अक्साई चीन समुद्र तल से 5000 मीटर ऊंचाई पर है और अरुणाचल प्रदेश भी एक पहाड़ी क्षेत्र है इसकी कई चोटियाँ 7000 मीटर से भी अधिक ऊँची है। चीन पहाड़ी क्षेत्र में युद्ध में माहिर था और उसका ज्यादातर ऊँचे क्षेत्रो पर कब्ज़ा था जिसका उसने बखूबी फायदा उठाया था।


1962 युद्ध के बाद -
इस युद्ध के बाद चीनियों ने कहा की यह लड़ाई  चीन ने अपने पश्चिम क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए कि थी।  भारत ने युद्ध के बाद फॉरवर्ड निति का त्याग कर दिया तथा वास्तविक नियंत्रण रेखा वास्तविक सीमाओं में बदल गयी।

जेम्स केल्विन के अनुसार "चीन ने भले ही सैन्य विजय प्राप्त कर ली हो परन्तु उसने अपनी इससे अंतर्राष्ट्रीय छवि को खराब कर लिया"। अमेरिका को तो पहले ही चीन की ऐसी नीतियों पर शक था।  इन देशो माना की चीन का लक्ष्य विश्व विजेता बनने का है और चीन को एक हमलावर कहा  .

युद्ध के बाद भारतीय सेना में बहुत बदलाव आये और भविष्य में इस तरह की परिस्थितियों के लिए तैयार रहने की जरुरत महसूस हुई।  इस युद्ध के बाद जवाहर लाल नेहरू पर दबाव बढ़ गया था।  कुछ लोग मानते है  की चीन की ऐसी घटिया नीतियों के बारे सरदार पटेल ने 1949 में ही नेहरू को अपने लिखे पत्र द्वारा अवगत करा दिया था। नेहरू ने इस पत्र को हलके में लिया जिसके बावजूद हमे ऐसी कठिन घडी का सामना करना पड़ा था।


भारत ने अमरीका की सलाह पर वायुसेना का उपयोग नहीं किया वो ही सबसे बड़ी भूल साबित हुई थी।  युद्ध के बाद अमेरिका की गुप्तचर संस्था CIA ने बताया की उस समय तिब्बत में चीन के पास न तो प्राप्त मात्रा में ईंधन था और न ही बड़ा रनवे था इसलिए चीन ने वायुसेना का उपयोग नहीं किया था।

इस युद्ध के बाद भारतीय लोगो में देशभक्ति की भावना जागनी शुरू हो गयी और इस समय शहीद हुए सेनिको के स्मारकों का निर्माण किया गया था। सबसे प्रमुख सबक जो भारत ने लिया वो यह था - देश को मजबूत बनाना और चीन के साथ नेहरू की " भाईचारे वाली निति में बदलाव करना।

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