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10 January 2019

महात्मा गाँधी से जुड़े 5 बड़े सवाल जिनका जवाब हर भारतीय जानना चाहता है

मोहनदास करमचन्द गान्धी का जन्म पश्चिमी भारत में वर्तमान गुजरात के एक तटीय शहर पोरबंदर नामक स्थान पर 2 अक्टूबर सन् 1869 को हुआ था. उनके पिता करमचन्द गान्धी सनातन धर्म की पंसारी जाति से सम्बन्ध रखते थे और ब्रिटिश राज के समय काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत पोरबंदर के दीवान अर्थात् प्रधान मन्त्री थे. आइये जानते है महात्मा गाँधी से जुड़े उन बड़े सवालों को जिनको हर भारतीय जानना चाहता है

महात्मा गाँधी कौन थे ? ( Who was Mahatma Gandhi? )

मोहनदास करमचंद गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था , वे करमचंद गाँधी और पुतलीबाई के तीन बेटो में सबसे छोटे थे . मोहनदास के पिता करमचंद गाँधी काठियावाड़ रियासत के दीवान थे . महात्मा गाँधी ( Mahatma Gandhi ) ने अपनी आत्मकथा ( Autobiography ) " में लिखा है कि बचपन में उनके जीवन पर परिवार और माँ के धार्मिक वातावरण और विचार का गहरा असर पड़ा था . आगे उन्होंने लिखा है कि राजा हरिश्चन्द्र नाटक से उनके मन में सत्यनिष्ठा ( Integrity ) के बीज पड़े थे.

 इनकी शुरूआती पढाई स्थानीय स्कूलों में हुई थी और ये पढने में हमेशा औसत ही रहे . सन 1883 में लगभग 13 वर्ष कि उम्र में लगभग एक साल बड़ी कस्तूरबा से उनका विवाह हो गया था . गाँधी ( Mahatma Gandhi ) ने बताया है कि शुरू शुरू में वे ईर्ष्यालु ( Suspicious ) और अधिकार जमाने वाले पति थे. उन्होंने 1888 में ब्रिटेन से वकालत कि पढाई के लिए गये और 1891 में वापस देश लौट आये. 1893 में गुजरती व्यापारी शेख अब्दुल्ला के वकील के तौर पर अफ्रीका गए थे 

अफ्रीका में गाँधी ने प्रवासी भारतीयों के अधिकारों और ब्रिटिश शासको कि रंगभेद निति ( Apartheid policy ) के खिलाफ सफल आन्दोलन किये. तब उनके कामो कि गूज भारत तक साफ़ सुनाई दे रही थी . 1915 में गाँधी मुंबई ( बम्बई ) वापस आये जहां उनका स्वागत गोपाल कृष्ण गोखले और अन्य कांग्रेसियों ने किया था . भारत आने के बाद 1915 में गुजरात के अहमदाबाद में उन्होंने सत्याग्रह आश्रम ( Satyagrah Ashram ) की स्थापना की थी.
आइये बढ़ते है अगले सवाल कि और

महात्मा गाँधी को अभी तक नोबेल शांति  पुरुस्कार क्यों नहीं मिला ( Why Mahatma Gandhi has not yet received the Nobel Peace Prize? )

महात्मा गाँधी ( Mahatma Gandhi ) का नाम नोबेल शांति पुरूस्कार ( Nobel Peace Prize ) के पांच बार प्रस्तावित हुआ था फिर भी उनके यह पुरुस्कार नहीं मिल पाया. उनका नाम 1937, 1938, 1939 , 1947 और 1948 नोबेल पुरुस्कार के लिए भेजा गया था. अंत में 1948 को उनका पुरुस्कार तय माना जा रहा था परन्तु इसी साल उनकी हत्या कर दी गयी थी. इनकी हत्या के चलते पुरुस्कार समिति ( Nobel Foundation ) के सामने बड़ी समस्या आ गयी थी क्योंकि यह पुरुस्कार तब तक मरणोपरांत नहीं दिया जाता था


 दूसरा ये कि अगर शांति पुरुस्कार गाँधी ( Mahatma Gandhi ) को दे तो इनामी राशी किसे मिलेगी यह तय करना मुस्किल था क्योंकि न तो कोई उनकी संस्था थी और न ही गांधीजी ने कोई वारिस बनाया था. इसलिए नतीजन हुआ ये कि 1948 का नोबेल शांति पुरुस्कार किसी को भी नहीं दिया गया.तब उस साल पुरुस्कार समिति ( Nobel Foundation ) ने बयान में कहा था - हम नामित जीवित व्यक्तियों में से किसी को इसके लायक नहीं समझते है जिसको यह पुरुस्कार दिया जाए. इस बयान का अर्थ निकाले तो यह निकलता है कि उस साल यह पुरुस्कार गांधीजी को जरुर मिलता .

महात्मा गाँधी ने भगतसिंह को बचाने कि कोशिश क्यों नहीं की ? ( Why Mahatma Gandhi did not try to save Bhagat Singh? )

शहीद-ए-आजम भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ने 23 मार्च 1931 को लाहौर में हँसते हँसते मौत को गले लगा लिया था. इस समय इन तीनो को छोड़कर बाकी सभी कैदियों की आँखे नम थी. आज भी भगतसिंह कि मौत का जिम्मेदार गांधीजी को ही माना जाता है चाहे सोशल मीडिया हो या भगतसिंह पर बनी फिल्मे हो सभी ने महात्मा गाँधी को नकारात्मक भूमिका में दिखाया है.

गांधीजी हमेशा से ही हिंसा के विरोधी और अहिंसा के समर्थक थे उनका मानना था कि हिंसा से आजादी नहीं मिल सकती है इनसे सिर्फ मुश्किले ही मिल सकती है. जबकि भगतसिंह हिंसा से आजादी में विश्वास रखते थे.
साल 1928 में लाला लाजपत राय साइमन कमिशन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे जहां पर अंग्रेज अधिकारियो ने लाठियों से उनको घायल कर दिया था इसके कुछ दिन बाद लाला जी चल बसे थे. इस पर भगतसिंह को गुस्सा आया और भगतसिंह ने बदला चुकता करने के लिए अंग्रेज अधिकारी स्कॉट कि हत्या की योजना बनाई परन्तु एक मित्र की गलती के कारण 21 साल के पुलिस अधिकारी सांडर्स मारा गया. इस मामले में भगतसिंह को मौत की सजा मिली थी.



5 मार्च 1931 को गाँधी-इरविन समझोता हुआ था जिसमे अहिंसक तरीके से आन्दोलन करने वाले क्रांतिकारियों को छोड़ने की बात हुई थी. जिनमे सुभाषचन्द्र बोस और अन्य कांग्रेसी बाहर आये. परन्तु भगतसिंह को मौत की सजा में गिरफ्तार किया गया था इसलिए भगतसिंह और उनके साथियों को रिहा नहीं किया था.

ऐसा आज भी माना जाता है कि गांधीजी ने भगतसिंह की और कम ही ध्यान दिया था. गाँधी-इरविन समझोते का सुभाषचंद्र ने भी विरोध किया था और पूरे देश लोग भी विरोध कर रहे थे. हर तरफ गाँधीजी का विरोध किया गया. हालांकि गांधीजी भगतसिंह को बचाने के कानूनी तरीके खंगाल रहे थे ताकि किसी तरह इनकी सजा कम करवा दी जाए और बाद में भगतसिंह को बचा लिया जाए पर अंग्रेज सरकार यह मानने को तैयार नहीं थी. 23 मार्च 1931 को भगतसिंह , राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई. इसके बाद लाहोर अधिवेशन में गाँधी का स्वागत काले फूलो और काले कपड़ो के साथ किया था. लोग उनका विरोध कर रहे थे.

भगतसिंह की फांसी पर गांधीजी ने लिखा है कि - मै जितने तरीको से वायसराय को समझा सकता था मैंने पूरी कोशिश की इससे ज्यादा मेरे पास शक्ति नहीं थी. मैने 23 तारीख को सुबह भी वायसराय को पत्र लिखा जिसमे मैंने अपनी पूरी आत्मा उड़ेल दी. पर उन्होंने मेरी बात नहीं मानी और भगतसिंह को फांसी दे दी गई.

हम आपको यहाँ बता दे कि भगतसिंह भी अपनी फांसी की सजा को रुकवाने के खिलाफ थे जब उनके पिता ने सजा को रुकवाने का प्रयास किया तो भगतसिंह ने पत्र लिखकर कड़ा विरोध किया था.



नाथुराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या क्यों की थी ? ( why nathuram godse assassinated gandhi )

इस सवाल का जवाब पाने के आप निचे दिए link पर जाए -
नाथुराम गोडसे कौन थे ? और इन्होने महात्मा गाँधी की हत्या क्यों की ? why nathuram godse assassinated gandhi

गाँधी ने जवाहरलाल नेहरु को सरदार पटेल कि जगह प्रधानमंत्री क्यों बनाया गया था ?

इस सवाल का जवाब पाने के लिए आप नीचे दिए लिंक पर जाए

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